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केवलारी में किसान आंदोलन: बेपरवाह प्रशासन और निष्क्रिय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ फूटा किसानों का गुस्सा

तीन घंटे तक थमा सिवनी-मंडला मार्ग, किसानों के उग्र आंदोलन ने खोली सरकार की पोल

केवलारी: “अन्नदाता” जब सड़क पर बैठने को मजबूर हो जाए, तो यह सरकार और प्रशासन की असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण होता है। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के केवलारी तहसील में किसानों ने पानी की मांग को लेकर जबरदस्त आंदोलन किया। संजय सरोवर भीमगढ़ बांध से टेल क्षेत्र तक पानी न पहुंचने के कारण सैकड़ों गांवों के किसानों की फसलें सूखने की कगार पर हैं, लेकिन शासन-प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधि तक सबने आंखें मूंद रखी हैं।
इस उपेक्षा और लापरवाही के खिलाफ 21 फरवरी को आक्रोशित किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ सिवनी-मंडला मार्ग पर चक्काजाम कर दिया। तीन घंटे तक यह महत्वपूर्ण सड़क ठप रही, जिससे यातायात प्रभावित हुआ और प्रशासन में हड़कंप मच गया।

प्रशासन की संवेदनहीनता: किसानों को रोना पड़ा खून के आंसू

केवलारी क्षेत्र के किसानों को संजय सरोवर भीमगढ़ बांध से सिंचाई के लिए पानी मिलना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि पानी टेल क्षेत्र तक पहुंच ही नहीं पा रहा। किसान लगातार प्रशासन से गुहार लगा रहे थे, लेकिन न तो अधिकारी जागे और न ही जनप्रतिनिधियों ने सुध ली। जब हालात बेकाबू हो गए, तो किसानों को मजबूरन सड़क पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद करनी पड़ी।

“नेता सिर्फ वोट मांगने आते हैं, संकट में कोई साथ नहीं”

इस आंदोलन के दौरान किसानों का गुस्सा सिर्फ प्रशासन पर ही नहीं, बल्कि अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधियों—सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते और विधायक रजनीश सिंह—पर भी फूटा। किसानों ने इन नेताओं पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव के समय तो वे बड़े-बड़े वादे करने आते हैं, लेकिन जब किसानों पर संकट आता है, तो वे नदारद रहते हैं।

किसान नेता स्वराजसिंह बघेल का बयान:
“जब वोट चाहिए होते हैं, तब ये नेता गांव-गांव घूमते हैं, लेकिन अब जब हमारी फसलें सूख रही हैं, तब कोई मदद के लिए नहीं आ रहा। अगर प्रशासन और सरकार ने समय रहते समाधान नहीं किया, तो अगला आंदोलन और उग्र होगा।”

प्रशासन की नींद टूटी, किसानों को लिखित आश्वासन

लगभग तीन घंटे तक चले इस आंदोलन के बाद केवलारी के एसडीएम महेश अग्रवाल और जल संसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री विनोद उईके मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने किसानों को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन आक्रोशित किसानों ने 10 दिनों के भीतर पानी देने का लिखित आश्वासन मिलने तक आंदोलन खत्म करने से इनकार कर दिया।
बड़ी मशक्कत के बाद प्रशासन ने किसानों को आश्वासन दिया कि 10 दिनों के भीतर उनकी मांगें पूरी की जाएंगी। इसके बाद ही किसानों ने सड़क से हटने का निर्णय लिया।

“अगर वादे पूरे नहीं हुए, तो अगला आंदोलन और बड़ा होगा”

किसानों ने स्पष्ट कर दिया कि यदि 10 दिनों में सिंचाई के पानी की आपूर्ति बहाल नहीं हुई, तो वे और बड़े आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
किसान नेता दामोदर प्रसाद शुक्ला का बयान:
“हमें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि समाधान चाहिए। अगर हमें धोखा दिया गया, तो यह आंदोलन सिर्फ केवलारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे जिले में सरकार के खिलाफ विद्रोह होगा।”

किसानों के दर्द से बेखबर नेता: आंदोलन के बीच जश्न में डूबे भाजपा के दिग्गज!

जब केवलारी में सैकड़ों किसान अपनी सूखती फसलें और बुझते सपने लेकर सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे, तब भाजपा के बड़े नेता जश्न मना रहे थे। आंदोलन स्थल से महज 15 किलोमीटर दूर पलारी में भाजपा की नवनियुक्त जिला अध्यक्ष मीना बिसेन के स्वागत समारोह में जिले के भाजपा नेता, पूर्व विधायक राकेश पाल सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री व वर्तमान सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते शान से मंच की शोभा बढ़ा रहे थे।
सबसे शर्मनाक बात यह रही कि सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते को किसानों के इस बड़े आंदोलन की ख़बर थी, लेकिन उन्होंने वहां जाने की जरूरत तक नहीं समझी। बल्कि, वे किसानों की चीख-पुकार से बचते हुए केवलारी की दूसरी सड़क से चुपचाप निकल गए।

क्या यही हैं जनता के रहनुमा?

जो नेता किसानों के वोट से संसद तक पहुंचे, वे आज उन्हीं किसानों की समस्या से मुंह मोड़कर वाहवाही लूट रहे हैं। यह घटना भाजपा नेताओं की संवेदनहीनता और दोहरे चरित्र का सबसे बड़ा उदाहरण है। किसान भूख-प्यास और सूखी फसलों के साथ संघर्ष कर रहे हैं, और उनके नेता मंचों पर फूल-मालाओं से लदे, स्वागत समारोह में व्यस्त हैं।

नेताओं की बेरुखी से भड़का किसानों का गुस्सा, क्या अब होगा सत्ता का असली फैसला?

केवलारी में जब सैकड़ों किसान अपनी सूखती फसलें और उजड़ते भविष्य को लेकर सड़क पर संघर्ष कर रहे थे, तब भाजपा के नेता गुलदस्ते और माला पहनने में व्यस्त थे। सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते ने किसानों के आंदोलन को नजरअंदाज कर केवलारी की दूसरी सड़क से निकलने का रास्ता चुन लिया, लेकिन सवाल यह है कि कब तक नेता किसानों की तकलीफों से मुंह मोड़ते रहेंगे? क्या सत्ता में बैठे लोग सिर्फ चुनाव के समय ही किसानों को याद करेंगे? या फिर यह आंदोलन सरकार के जनविरोधी रवैये का आईना बनकर उनके भविष्य पर सवाल खड़ा करेगा? किसानों का गुस्सा अब सिर्फ नारों तक सीमित नहीं, बल्कि आगामी चुनाव में सत्ताधारियों की नींद उड़ाने वाला साबित हो सकता है।

विधायक और सांसद की चुप्पी पर सवाल

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान क्षेत्रीय विधायक रजनीश सिंह और सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते ने किसानों के मुद्दे पर कोई बयान तक नहीं दिया। इस चुप्पी से किसानों का आक्रोश और बढ़ गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि किसान आंदोलन लंबा चला, तो आगामी चुनाव में भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। किसान पहले ही संकेत दे चुके हैं कि यदि उनके अधिकारों की अनदेखी होती रही, तो वे चुनाव में इन जनप्रतिनिधियों को सबक सिखाएंगे।

सरकार और प्रशासन के खिलाफ किसानों की हुंकार

किसानों के इस आंदोलन ने सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह आंदोलन केवल पानी की मांग तक सीमित नहीं, बल्कि सरकार की नाकामी और जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता का भी प्रतीक बन गया है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन अपने वादे पर खरा उतरेगा, या फिर किसानों को एक और आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा? यदि समय रहते समस्या का हल नहीं निकला, तो यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है, जिसकी जिम्मेदारी प्रशासन और स्थानीय नेताओं पर होगी।
अब देखना होगा कि 10 दिनों के भीतर सरकार क्या कदम उठाती है, या फिर केवलारी में किसानों का आक्रोश और ज्यादा भड़कता है!

“विनोद उईके – कार्यपालन यंत्री, सिचाई विभाग सिवनी”

“महेश अग्रवाल – SDM केवलारी”

“डॉ. प्रमोद राय – किसान नेता”

“शुभम बघेल – किसान नेता”

Devraj Dehariya

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